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सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन से गुजर रहा भारतवर्षअपनी परंपराओं से दूर होते लोग चिंतनीय विषयअपनी जड़ों को छोड़ बाहर घर बना रहे हिमाचली

सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन से गुजर रहा भारतवर्ष
अपनी परंपराओं से दूर होते लोग चिंतनीय विषय
अपनी जड़ों को छोड़ बाहर घर बना रहे हिमाचली
भारतवर्ष, जिसे सनातन मूल्यों और आध्यात्मिक परंपराओं की भूमि के रूप में जाना जाता है, आज एक नए सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। 
हाल ही में जिला सोलन के अर्की क्षेत्र के गांव सावग-शिवनगर में आयोजित श्रीराम कथा में आचार्य श्री भगतराम नड्डा जी ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि देश के लोग धीरे-धीरे अपनी जड़ों और परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं।
उन्होंने भारत को केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि “सनातन धर्म” का प्रतीक बताया, जो हर व्यक्ति के जीवन में निहित है। उन्होंने कहा कि इस भूमि की पहचान सम्मान, मर्यादा और पारिवारिक मूल्यों से है, जहाँ माता-पिता को सर्वाेच्च आदर दिया जाता है और सामाजिक व्यवस्था इन मूल्यों पर आधारित होती है। 
यह सिर्फ भारतवर्ष में ही संभव है जहां मां को मां कहा जाता है और पिता को पिता कहा जाता है। ाारत की आध्यात्मिक समृद्धि का उल्लेख करते हुए उन्होंने सात पवित्र नदियों, बारह ज्योतिर्लिंगों, चार धाम और सात पुरियों का जिक्र किया। उनके अनुसार, यह धार्मिक धरोहर भारत को विश्व में एक विशेष स्थान दिलाती है और इसे “देवभूमि” बनाती है।
हालांकि, आचार्य जी ने वर्तमान समय में बढ़ती प्रवासी प्रवृत्ति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में लोग बेहतर अवसरों की तलाश में हिमाचल से बाहर बस रहे हैं, जिससे वे अपनी जन्मभूमि और सांस्कृतिक पहचान से दूर हो रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को प्रभावित कर रही है, बल्कि देश की सांस्कृतिक जड़ों को भी कमजोर कर रही है।
उन्होंने ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ देते हुए कहा कि प्राचीन काल में भी लोग भारत को शांति और आध्यात्मिकता का केंद्र मानते थे। हर क्षेत्र में मंदिरों की उपस्थिति और धार्मिक परंपराओं का पालन इस बात का प्रमाण है कि भारत एक समय पूर्णतः आध्यात्मिक जीवनशैली का प्रतीक था।
वक्ता ने यह भी कहा कि वर्तमान समय में समाज में पाखंड और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, जिससे नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपनी जड़ों को पहचानें और सनातन परंपराओं को पुनर्जीवित करें। उनका कहना है कि वैश्वीकरण के इस दौर में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, ताकि आधुनिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत भी सुरक्षित रह सके।

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